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एजुकेशन सिस्टम की खामियां उजागर करती है व्हाय चीट इंडिया फिल्म

व्हाय चीट इंडिया, एजुकेशन सिस्टम की खामियां उजागर करती है फिल्म, इमरान की एक्टिंग में दिखा दम


बॉलीवुड डेस्क-इमरान हाशमी की ‘व्हाय चीट इंडिया’ का उद्देश्य ताे मौजूदा दौर के लिहाज से एकदम सटीक है लेकिन इसका एक्जीक्यूशन पुराने ढंग से किया गया और नीरस है। यह फिल्म निर्देशक सौमिक सेन का प्रयास है जिसमें देश की त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली पर जबरदस्त तंज कसा गया है।

राकेश सिंह उर्फ रॉकी (इमरान हाशमी) एक ऐसा चालाक आदमी है जो कि गरीब लेकिन होशियार और काबिल स्टूडेंट्स से नाकारा अमीर बच्चों के लिए एंट्रेंस एग्जाम्स दिलवाता है और उन अमीर बच्चों के माता-पिता से खूब पैसे वसूलता है। रॉकी केवल नकद में सौदा करता है और ऐसा करते हुए वह पकड़ा न जाए इसके सारे पैंतरे उसे आते हैं।

सत्येंद्र दुबे उर्फ सत्तू (स्निग्धदीप चटर्जी ) एक उज्ज्वल इंजीनियरिंग छात्र है, जो अपने गरीब लेकिन अति महत्वाकांक्षी पिता के दबाव में है। रॉकी हमेशा सत्येंद्र की कमजोरी का फायदा उठाकर उसे जाल में फंसाता है, जिससे वह कभी नहीं निकाल पाता। इस बीच, सत्येंद्र की बहन नुपुर (श्रेया धनवंतरी) को रॉकी से प्यार हो जाता है।

रॉकी एजुकेशन सिस्टम में खामियों का सबसे अच्छा उपयोग करता है, वह अपने कामों के लिए फालतू के कारण बताकर उसे जस्टिफाई करने की कोशिश करता है। वह अहंकारी है और यह जानता है कि जब भी वह पकड़ा जाता है, तो इससे बाहर कैसे निकलना है। रॉकी तब तक अजेय लगता है जब तक कि घटनाओं के एक आश्चर्यजनक मोड़ के बीच अनजाने में वह पकड़ा नहीं जाता।

इमरान ने फिल्म में यथार्थ अभिनय किया है। एक चालाक आदमी के रूप में वे दुनिया को ये समझाने का प्रयास करते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह समाज के हित में है। हालांकि नीरस और असंगत पटकथा और फीका डायरेक्शन आपको रॉकी की यात्रा में शामिल होने से रोकता है। सेन के निर्देशन में उस समय स्पार्क दिखता है जब वह इस बात पर जोर देते हैं कि एक क्रिमनल अपने परिवार के साथ वैसा ही रहता है जिस तरह हम और आप।

रॉकी और नुपूर का लव ट्रेक फिल्म में वैल्यू एडिशन करने की जगह जबरदस्ती डाला लगता है। फिल्म का फर्स्ट हाफ आपको इंगेज रखता है जिसमें आप पैसों का स्वाद चखने के बाद सत्तू का पतन होते देखते हैं। सेकंड हाफ में ट्विस्ट होने के बाद भी यह आपको बांधकर नहीं रख पाता।

फिल्म में भाई-बहन का किरदार निभाने वाले दोनों युवा कलाकार स्निग्धादीप चटर्जी और श्रेया धनवंतरी ने अच्छा अभिनय किया है। जबकि शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार की कहानी आज भी बहुत प्रासंगिक है वही सेन का डायरेक्शन थोड़ा और मजबूत होना चाहिए था।

इस फिल्म को देखें क्योंकि यह एक प्रासंगिक विषय पर जोर देती है कि सिस्टम को बदलने की सख्त जरूरत क्यों है। यह हर उस बच्चे के भयंकर दबाव को भी उजागर करती है जो महत्वाकांक्षी और नियंत्रण में रखने वाले भारतीय माता-पिता अपने बच्चों पर डालते हैं।

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