पंजाब

ग्रामीण विकास फंड संबंधी केंद्र सरकार का फ़ैसला मन्दभागा, ऐसी कोई रिवायत नहीं – मुख्यमंत्री

मनप्रीत बादल को मसले के हल के लिए केंद्रीय मंत्री को मिलने के लिए कहा, केंद्र को फ़ैसले पर फिर से गौर करने की अपील
चंडीगढ़ – पंजाब के ग्रामीण विकास फंड (आर.डी.ऐफ.) को रोक लेने के फ़ैसले को मन्दभागा करार देते हुये पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने आज केंद्र सरकार को फ़ैसले पर फिर से गौर करने की अपील की है क्योंकि इस कदम से राज्य में ग्रामीण विकास कामों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।केंद्र सरकार के इस फ़ैसले के समय पर सवाल उठाते हुये मुख्यमंत्री ने कहा कि आर.डी.ऐफ. जारी न करने की ऐसी कोई रिवायत नहीं है जो पिछले फंडों का प्रयोग की जांच के दौरान राज्य का बकाया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने इस मसले को सुलझाने के लिए वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को दिल्ली जाकर उपभोक्ता मामलों संबंधी केंद्रीय मंत्री को मिलने के लिए कहा है क्योंकि इस कदम ने राज्य को पेश वित्तीय संकट के दरमियान और चोट पहुंचायी है।कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कहा कि राज्य सरकार फंडों के प्रयोग संबंधी केंद्र सरकार की तरफ से माँगे गए विवरण सौंपेगी जैसे कि बीते समय में भी किया जाता रहा है। केंद्र सरकार की तरफ से लिए गए फ़ैसले पर गंभीर चिंता ज़ाहिर करते हुये उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है कि भारत सरकार की तरफ से इस्तेमाल किये गए फंडों की जांच की जानी हो परन्तु जहाँ तक आर.डी.ऐफ. जारी न करने का सम्बन्ध है, ऐसा पहली बार हुआ है।मुख्यमंत्री ने कहा कि खेती कानूनों पर विवाद और संकट के दरमियान 1000 करोड़ रुपए से अधिक राशि के रूप में आर.डी.ऐफ. की अदायगी पंजाब को जारी न करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के समय पर अलग-अलग तरफ से शंकाएं ज़ाहिर की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि फ़ैसला लेने का समय संदिग्ध है और यह कदम संदेहयुक्त इरादे की तरफ इशारा करता है।मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार को फ़ैसले पर तुरंत फिर से गौर करने और राज्य को आर.डी.ऐफ. के फंडों की अदायगी करने की अपील करते हुये कहा कि बीते समय की तरह मौजूदा समय भी इन फंडों की जांच जारी है।मुख्यमंत्री ने कहा कि जैसे कि केंद्र सरकार को भली-भाँति पता है कि इन फंडों को राज्य की अनाज मंडियों, ग्रामीण इलाकों में सडक़ों के निर्माण कामों जैसे अहम कृषि मंडीकरण बुनियादी ढांचे पर ख़र्चा जाता है। उन्होंने कहा कि यह फंड जारी न करने की सूरत में गाँव के विकास में रुकावट पड़ेगी और किसानों में गुस्सा और बढ़ेगा जो पहले ही केंद्रीय खेती कानूनों के खि़लाफ़ लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।

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