चंडीगढ़ – सेहत मंत्री ब्रह्म महिंद्रा ने कहा है कि कांग्रेस सरकार ने नहीं, बल्कि बादलों ने अपने विशेष हितों की खातिर बठिंडा में एम्स प्रोजेक्ट में देरी करवाई है। इसके अलावा, इन्होंने इन्हीं कारणों के चलते मोहाली मेडिकल कॉलेज को इजाजत नहीं मिलने दी।उन्होंने केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल द्वारा लगाए आरोपों कि पंजाब सरकार द्वारा देरी किए जाने के चलते बठिंडा एम्स में कक्षाएं नहीं शुरू हो सकी, के जवाब में कहा कि केंद्रीय मंत्री इस बात से पूरी तरह से अज्ञात लगती हैं कि बठिंडा में कक्षाएं नहीं शुरू हुई। जबकि उनके लिए फरीदकोट में पहले से मंजूरी मिल चुकी है।उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री प्रोजेक्ट में देरी की जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डालने की कोशिश कर रही हैं, बावजूद इसके कि यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी। हालांकि वह केंद्रीय मंत्री की हमसे उम्मीदों का स्वागत करते हैं, कि जो काम उनकी सरकार 3 सालों में नहीं कर सकी उसे हमारे, वह ओर से रात भर में पूरा किया जाने की उम्मीद कर रही हैं। उन्होंने बादल सरकार की ओर से दो अलग-अलग प्रोजेक्टों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देरी और उन्हें मना किए जाने सबंधी जानकारी देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर जानबूझकर विशेष हितों की खातिर भारत सरकार के मोहाली में एक मेडिकल कॉलेज स्थापित करने संबंधी प्रस्ताव को मना करने का आरोप लगाया ताकि उसका फायदा क्षेत्र के कुछ निजी अस्पतालों को मिल सके और इन्हीं कारणों के चलते वह जानबूझकर बठिंडा प्रोजेक्ट पर बैठे रहे, क्योंकि बादल राज्य में कुछ निजी मेडिकल संस्थाओं की सहायता करना चाहते थे।महिंद्रा ने कहा कि केंद्रीय मंत्री को यदि पंजाब से डॉक्टरों की चिंता होती तो वह मोहाली मेडिकल कॉलेज पर जोर देती। जहां एम्स की बजाए राज्य से अधिकतर छात्र पढ़ते, ना कि देश भर से। जबकि हरसिमरत द्वारा लगाए आरोपों कि एम्स बठिंडा में समय पर कक्षाएं ना शुरू होने के लिए पंजाब सरकार जिम्मेदार है, के जवाब में महिंद्रा ने कहा कि एम्स बठिंडा और मोहाली मेडिकल कॉलेज यह दोनों प्रोजेक्ट साल 2014 में मंजूर हुए थे। लेकिन बादल सरकार एक पर जानबूझकर बैठी रही, जबकि दूसरे को निजी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों को फायदा पहुंचाने की खातिर रद्द कर दिया।सेहत मंत्री ने खुलासा किया कि एम्स बठिंडा को 2014 में मंजूरी मिली थी। अकाली-भाजपा सरकार के पास इसे शुरू करने के लिए 3 साल थे। लेकिन इन्होंने इस प्रोजेक्ट को ना सिर्फ बहुत लेट किया, बल्कि इसका नीव पत्थर भी 2017 विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव आचार संहिता लागू होने से मात्र 1 माह पहले 11 नवंबर 2016 को रखा गया। जिससे स्पष्ट होता है कि प्रोजेक्ट को लेकर इनके इरादे गंभीर नहीं थे। इसी तरह मोहाली मेडिकल कॉलेज को भारत सरकार की ओर से “इस्टैब्लिशमेंट ऑफ न्यू मेडिकल कॉलेजेस अटैचड विद एक्जिस्टिंग डिस्ट्रिक्ट रेफरल हॉस्पिटल्ज स्कीम” के तहत मंजूर किया गया था, लेकिन उसे पूर्व मुख्यमंत्री ने मंजूर नहीं किया। स्कीम के तहत 75% फंड भारत सरकार ने मुहैया करवाने थे, जबकि 25% राज्य सरकार ने। हालांकि भारत सरकार द्वारा बार-बार याद करवाने के बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री बादल ने 22 मई 2015, 29 दिसंबर 2015 और 18 जनवरी 2016 को प्रस्ताव रद्द कर दिया, खास तौर पर निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए 30 अक्टूबर 2016 को-स्टेटस के ऑर्डर जारी करवाएं।महिंद्रा ने खुलासा किया कि भारत सरकार ने देश भर में 50 मेडिकल कॉलेज मंजूर किए थे और मोहाली मेडिकल कॉलेज सिर्फ एक मात्र था, जो बादलों के विशेष हितों के चलते राज्य को नहीं मिल सका। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार और विशेषकर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की कोशिशों के चलते, जिन्होंने भारत सरकार को लिखा कि राज्य मोहाली मेडिकल कॉलेज के लिए तैयार है, राज्य सरकार को इसकी मंजूरी मिली और अब राज्य सरकार को इसके लिए 40% हिस्सा डालना होगा। उन्होंने सवाल किया कि क्या बादल निजी संस्थाओं को फायदा पहुंचाना चाहते थे, जब राज्य सरकार को सिर्फ 25% हिस्सा ही डालना था। जबकि बिजली की मंजूरी देने में देरी करने संबंधी आरोपों पर उन्होंने कहा कि इससे राज्य सरकार ने बीते साल जुलाई में ही मंजूरी दे दी थी।