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जीएसटी काउंसिल की 34 वीं बैठक: बिल्डर नई-पुरानी दोनों दरों से टैक्स देने का विकल्प चुन सकेंगे

जीएसटी काउंसिल की 34 वीं बैठक में फैसला लिया गया है कि बिल्डर नई-पुरानी दोनों दरों में टैक्स देने का विकल्प चुन सकते है। यह योजना केवल अप्रैल 2019 के पहले के घरों पर ही लागू होगी। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि अगर कीमतें गैरवाजिब तरीके से बढ़ी तो मुनाफेखोरी पर बनी समिति बिल्डर्स के खिलाफ कार्यवाही करेगी।

जीएसटी काउंसिल ने 31 मार्च से पहले बने घरों पर जीएसटी लगाने के लिए डेवेलपर्स को पुराने और नए जीएसटी सिस्टम में चुनने का विकल्प दे दिया है। गौरतलब है कि  जीएसटी काउंसिल की  पिछली बैठक में रियल एस्टेट पर लगने वाले जीएसटी रेट घटाने पर सहमति बनी थी जिसमें अफोर्डेबल घरों पर जीएसटी दर अब 8 फीसदी से घटाकर 1 फीसदी और अंडर कंस्ट्रक्शन घरों पर `जीएसटी 12 से घटाकर 5 फीसदी किया गया था।
 
रियल एस्टेट सेक्टर में जीएसटी की नई दरों कैसे लगाई जाएंगी उस पर राज्यों के बीच सहमति बन गई है। जीएसटी काउंसिल ने 34वीं बैठक में आम सहमति ने फैसला लिया कि राज्य सरकार और डेवेलपर घरों पर लगने वाले जीएसटी की रूपरेखा तय करेंगे। 1 फीसदी और 5 फीसदी के नए जीएसटी लगने के लिए 1 अर्पैल 2019 की समयसीमा तय कर दी गई है।  

जीएसटी काउंसिल की पिछली बैठक में निर्माणाधीन परियोजनाओं में मकानों पर जीएसटी की दर को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 फीसदी किया गया है। हालांकि इस पर डेवलपर को कोई इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलेगा। वहीं किफायती मकानों पर जीएसटी की दर को 8 प्रतिशत से घटाकर महज 1 फीसदी किया गया है और इस पर भी डेवलपर को इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलेगा। अब ग्राहकों को पुराने और नए दरों में मुनाफे के आधार पर फायदा मिलने की उम्मीद है।

वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अगर घरों की कीमतें गैरवाजिब तरीके से बढ़ाने की कोशिश की गई तो मुनाफेखोरी पर बनी समिति बिल्डर्स के खिलाफ कार्यवाही भी कर सकती है। जीएसटी काउंसिल ने किफायती मकानों की परिभाषा का दायरा बढ़ाते हुए 45 लाख रुपये तक के मकानों को इसमें रखा है। मेट्रो शहरों में 60 स्क्वायर मीटर या उससे कम की जगह में बने मकान किफायती मकानों की श्रेणी में आएंगे। जबकि गैर मेट्रो शहरों में यह सीमा 90 स्क्वायर मीटर होगी।

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