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कृषि कानूनों को लेकर आंदोलन कर रहे किसान संगठनों को नहीं मिल रहा व्यापक समर्थन

आने वाले कल यानी शुक्रवार को सरकार और किसान संगठनों के बीच कृषि क़ानूनों पर वार्ता प्रस्तावित है। लेकिन वार्ता होगी, इसको लेकर आशंकाएं कई सारी हैं। लेकिन इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कमिटी बनाने का आदेश देकर इसे एक अलग मोड़ दे दिया है। ऐसे में अब ये पूरा मामला एक महत्वपूर्ण मोड़ पर आ गया है।ये संवाद प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाने का एक और क़दम था, जिसमें एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति का गठन किया, तो वहीं अब शुक्रवार को सरकार के साथ आंदोलनरत किसान संगठनों की बैठक प्रस्तावित है। हालात अब ये हैं कि सरकार के साथ कई दौर की बातचीत, चार में से दो मांगों पर सहमति, देश की सबसे बड़ी अदालत का वार्ता से गतिरोध को दूर करने की कोशिशें, लेकिन आंदोलनरत किसान अब भी बीच की राह ढूंढने को तैयार नहीं दिखते हैं और कृषि क़ानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े दिखते हैं। कई सूचनाएं बताती हैं कि 15 जनवरी को होने वाली बैठक को लेकर फ़िलहाल स्थिति साफ़ नहीं है।दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन का गुरुवार को 50वां दिन रहा। सरकार के साथ कई दौर की बातचीत और सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद कुछ किसान संगठन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं।
कानून के अमल पर रोक लगाने और कमिटी बनाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर असंतोष जता चुके किसान नेताओं के बीच भी अहम बैठकों का दौर जारी है, जहां आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीतियों पर चर्चाएं हो रही हैं। वार्ता को आगे बढ़ाने की अपील करते हुए, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कमेटी बनाई है वो किसानों के हित में है।वहीं, चाहे सरकार हो या किसान संगठन दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट के बाद बैठक के मसले पर क़ानूनी जानकारों की राय ली जा रही है। इस बीच देशभर के किसानों संगठनों का नए कृषि सुधार क़ानूनों के समर्थन करने का सिलसिला भी लगातार जारी है।इस बीच, गुरुवार को ख़बर आई कि किसानों को लेकर बनाई गयी सुप्रीम की चार सदस्ययी समिति के सदस्य बीकेयू अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान ने समिति से अपना नाम वापस ले लिया। अपने बयान में मान ने कहा कि समिति में शामिल करने के लिए वो सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद देते हैं।
अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति के बैनर तले देश भर के दर्जन से ज्यादा किसान संगठनों ने तीनों किसान क़ानूनों पर अपना समर्थन जताया। इन किसान संगठनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के किसान संगठन शामिल थें। इतना ही नहीं, इन संगठनों के साथ साथ, राष्ट्रीय युवा वाहिनि, राष्ट्रीय अन्नदाता युनियन, भारतीय किसान युनियन, भारतीय कृषक समाज, किसान सेना जैसे संगठनों ने या तो पत्र लिखकर, मोर्चा निकालकर, लाखों किसानों के हस्ताक्षरों के साथ या केंद्रीय कृषि मंत्री से मिलकर अपने समर्थन को देश के सामने रखा है। लेकिन आख़िर देश का मूड है क्या आम लोग दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान संगठनों को लेकर क्या सोचते हैं। इसी के जानने की कोशिश की गई एक अखिल भारतीय सर्वेक्षण में, जिसे एक निजी प्रसारण कंपनी ने किया। ये सर्वेक्षण देश के 22 राज्यों में किए गए।
इस सर्वेक्षण के परिणाम बताते हैं कि सर्वे में शामिल करीब 54 (53.6) प्रतिशत लोगों ने चर्चित कृषि क़ानूनों का समर्थन किया है, जबकि करीब 57 प्रतिशत लोगों ने कहा कि किसानों का अपना विरोध प्रदर्शन अब समाप्त कर देना चाहिए। ग़ौरतलब है कि किसान संगठनों के समर्थन के अलावा, ग्रामीण भारत में काम करने वाले ग़ैर सरकारी संगठनों के समूहों ने पूरे देशभर से आम किसानों के क़रीब सवा तीन लाख हस्ताक्षर केंद्र सरकार तक पहुंचाए हैं, जो दिखाते हैं कि कैसे देशभर से आम हो या ख़ास किसान हो या मज़दूर कृषि सुधारों के समर्थन में लगातार आगे आते रहे हैं।

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