चंडीगढ – पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व अधीन मंत्रीमंडल ने राज्य में कृषि वन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए आज ‘दी पंजाब फॉरेस्ट प्रोड्यूस ट्रांजि़ट रूल्ज-2018’ और ‘दी पंजाब रैगूलेशन ऑफ वुड्ड बेस्ड इंडस्ट्रियल रूल्ज-2019’ को मंजूरी दे दी।नए नियम टिंबर ट्रांजि़ट में आए बदलाव के मुताबिक भारत सरकार द्वारा समय-समय पर जारी की गई हिदायतों /दिशा-निर्देशों के प्रकाश में लाया गया है।मुख्यमंत्री कार्यालय के एक सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि पंजाब में लकड़ी की ढुलाई के लिए पहले ‘कुल्लू, कांगड़ा, गुरदासपुर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (लैंड रूट) नियम, 1965’ लागू थे। यह नियम अविभाजित पंजाब पर लागू होते थे। इसलिए राज्य की नई हद-बंदी को ध्यान में रखते हुए और भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों को समय-समय पर जारी की गई हिदायतों /दिशा-निर्देशों के अनुसार टिंबर ट्रांसिट रूल्ज़ बनाने की ज़रूरत थी यह नये रूल्ज़ बनाने का मुख्य मंतव्य राज्य में एग्रो-फॉरैस्ट्री किस्मों जैसे कि पॉपुलर, सफ़ेदा, ड्रैक, शहतूत, सुब्बूल, सिलवर ओक, नीम, जंड, इंडियन विलो और गमारी को ट्रांजि़ट रूल्ज़ से छूट देने और प्राईवेट ज़मीन में उगाए गए बाँस को इन रूलों के दायरे से बाहर रखना है। पुराने नियमों में यह उपबंध नहीं थे।पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में बहुत से किसान बाँस की खेती करते हैं और राज्य से बाहर बेचते हैं। उनको ऐसा करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। इसको मुख्य रखते हुए नये नियमों में उचित उपबंध किये गए हैं जिससे यदि किसान चाहें तो वह बाँस को राज्य से बाहर ले जाने के लिए सम्बन्धित वन मंडल अफ़सर से इंटर स्टेट/पैन इंडिया पर्मिट प्राप्त कर सकते हैं। इससे राज्य में एग्रो-फॉरैस्ट्री से सम्बन्धित गतिविधियां करने वाले किसानों को बहुत लाभ पहुंचेगा।एक अन्य फ़ैसले में मंत्रीमंडल ने ‘दी पंजाब रैगूलेशन ऑफ वुड्ड बेस्ड इंडस्ट्रियल रूल्ज़-2019’ को भी मंजूरी दे दी है जिससे कृषि वन्य पर ज़ोर देने के साथ-साथ कृषि विभिन्नता को उत्साहित करने के अलावा किसानों के लिए सामाजिक-आर्थिक लाभ को यकीनी बनाया जा सके।नये नियमों के अनुसार एग्रो फॉरैस्ट्री किस्मों जैसे कि पॉपुलर, सफ़ेदा, डै्रक, शहतूत, सुब्बूल, सिलवरओक, नीम, जंड, इंडियन विलो और गमारी की लकड़ी से चलाई जाती यूनिटों को लायसंस लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इसकी केवल वन विभाग के पास रजिस्ट्रेशन करवानी पड़ेगी। प्रवक्ता ने यह भी बताया कि भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार स्थापित होने वाले लकड़ी आधारित उद्योग की राज्य में अधिसूचित सरकारी ब्लॉक वन, सुरक्षित क्षेत्रफल और निशानदेही युक्त और बिना निशानदेही सुरक्षित वनों से दूरी 10 किलोमीटर नियत की गई थी, परंतु वन विभाग द्वारा विचार-विमर्श के उपरांत नये नियमों में दूरी की सीमा 1 किलोमीटर हवाई दूरी रखी गई है। किसी अधिसूचित इंडस्ट्रियल अस्टेट/पार्क में स्थापित लकड़ी उद्योग को और एग्रो फॉरैस्ट्री किस्मों का प्रयोग करने वाली लकड़ी आधारित यूनिटों, जिन्हें लायसंस की ज़रूरत नहीं होगी, को एक किलोमीटर की हवाई दूरी की शर्त से छूट होगी।इसके अलावा एग्रो फॉरैस्ट्री किस्मों की लकड़ी का प्रयोग करने वाले लकड़ी आधारित उद्योगों की स्थापना करने से किसानों के एग्रो फॉरैस्ट्री के बढ़ावे, वृक्षों के अधीन क्षेत्रफल में वृद्धि और किसानों की आजीविका के विकल्प पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। इस कारण औद्योगिक यूनिटों द्वारा इस्तेमाल की गई लकड़ी के लिए उनसे 10 रुपए प्रति घनमीटर के हिसाब से ग्रीन फीस ली जायेगी, जो कि नये पौधे लगाने, एग्रो फॉरैस्ट्री के बढ़ावे और किसानों के हित में प्रयोग की जायेगी।गौरतलब है कि राज्य में लकड़ी आधारित उद्योग को नियमित करने के लिए ‘आरा मिल, वीनीर और प्लाईवुड उद्योग नियमित रूल्ज़-2006’ अमल में हैं।