मायावती ने एक अहम फैसला लेते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश के सभी 11 विधानसभा उपचुनाव बसपा अपने बलबूते चुनाव लड़ेगी. इससे पहले 2010 के बाद से बसपा कोई भी उपचुनाव नहीं लड़ी है. इस बदली रणनीति के पीछे इस चुनाव में गठबंधन साथियों से नाराजगी दिखती है, क्योंकि लोकसभा चुनावों के खत्म होते ही तमाम पार्टियों और गठबंधनों में उठापटक का दौर जारी है. पार्टियां अपने प्रदर्शन और गठबंधन की समीक्षा कर रही हैं. उत्तर प्रदेश में भी सपा और बसपा गठबंधन में नतीजों के बाद दरार आने लगी है. बसपा की अध्यक्ष मायावती ने लोकसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन पर क्षोभ व्यक्त करते हुए पार्टी के पदाधिकारियों से ‘गठबंधनों’ पर निर्भर रहने के बजाय अपना संगठन मजबूत करने का निर्देश दिया है.
लोकसभा चुनाव के परिणाम की समीक्षा के लिए मायावती ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के पार्टी पदाधिकारियों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बैठक की. सूत्रों के मुताबिक बैठक में मायावती ने आगामी उपचुनाव भी बीएसपी द्वारा अपने बलबूते लड़ने का पार्टी नेताओं को निर्देश दिया है. उन्होंने इस बाबत पार्टी पदाधिकारियों से उपचुनाव की तैयारियों में जुट जाने के लिए कहा है. लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के 11 विधायकों के चुनाव जीतने के बाद इन सीटों पर उपचुनाव प्रस्तावित है.
ऐसा कहकर मायावती ने भविष्य में गठबंधन नहीं करने का संकेत दिया है. उन्होंने विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में किए गए गठबंधन से उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने का हवाला देते हुए कहा कि अब बसपा अपना संगठन मजबूत कर खुद अपने बलबूते चुनाव लड़ेगी. सूत्रों के मुताबिक मायावती ने कहा कि बसपा को जिन सीटों पर कामयाबी मिली उसमें सिर्फ पार्टी के परंपरागत वोट बैंक का ही योगदान रहा.
दिल्ली स्थित बीएसपी कार्यालय में हुई बैठक में पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष आरएस कुशवाहा, राज्य में पार्टी के सभी विधायक, नवनिर्वाचित सांसद, प्रदेश के सभी जोनल कोऑर्डिनेटर के अलावा सभी जिला अध्यक्षों को भी बुलाया गया था. उल्लेखनीय है कि बसपा प्रमुख मायावती लोकसभा चुनाव परिणाम की पिछले तीन दिनों से राज्यवार समीक्षा कर रही हैं. इन बैठकों में मायावती लगातार पार्टी को मजबूत करने की बात कह रही है.
चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन से नाराज मायावती ने शनिवार की बैठक में दो राज्यों, मध्य प्रदेश और दिल्ली के बसपा अध्यक्षों सहित छह राज्यों के पार्टी प्रभारियों को पद से हटा दिया था.