आईएल एंड एफएस में पीएफ और रिटायरमेंट फंडों के पैसे भी फंसे
नई दिल्ली -संकटग्रस्त कंपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलएंडएफएस) के नव-नियुक्त निदेशकों की सुरक्षा के लिए सरकार ने सोमवार को नेशनल कंपनी लॉ टिब्यूनल (एनसीएलटी) में एक अर्जी दाखिल की। अर्जी में मांग की गई है कि कंपनी की समाधान प्रक्रिया में भविष्य के किसी विपरीत परिणाम की स्थिति में निदेशकों को जिम्मेदार न माना जाए। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने परहेज के तहत किसी भावी मुकदमे से इन निदेशकों को बचाने के लिए एनसीएलटी, मुंबई में याचिका लगाई है। पिछले साल पेमेंट में डिफॉल्ट करने वाली कंपनी इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएल एंड एफएस) में लाखों लोगों के पीएफ और रिटायरमेंट के पैसे भी दांव पर लगे हैं। पैसे लेने के लिए नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के पास करीब 100 याचिकाएं लगाई गई हैं। इनमें से आधी पीएफ, ग्रेच्युटी, रिटायरमेंट फंड और ट्रस्टों की हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं हो सका है कि इनमें कितने लोगों का कितना पैसा लगा है।
ट्रिब्यूनल में 29 मार्च को इसकी सुनवाई होने वाली है। जिन संगठनों ने आईएल एंड एफएस में पैसा लगाया था, उनमें निजी, सरकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फंड भी हैं। आईएल एंड एफएस के असेट बेचकर बकाया चुकाने में ये फंड समान अधिकार चाहते हैं।
एक
संगठन के प्रमुख ने कहा, ‘आईएल एंड एफएस में लोगों की जीवनभर की कमाई लगी
है। हम इसकी रिकवरी में सरकार से मदद चाहते हैं। सरकार को छोटे निवेशकों के
हितों के बारे में सोचना चाहिए। मौजूदा कानून बैंक और बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के पक्ष में हैं। ये सुरक्षित कर्जदाता की श्रेणी में आते हैं। ये
संगठित और शक्तिशाली भी हैं।’ आम लोगों से जुड़े जिन फंडों के पैसे फंसे
हैं उनमें इंडियन ऑयल ईपीएफ, इन्फोसिस ईपीएफ, ईआईएल ईपीएफ, एचयूएल यूनियन
प्रोविडेंट फंड, टाइटन पीएफ, आईडीबीआई ट्रस्टशिप, यूटीआई रिटायरमेंट फंड,
पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस और आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड भी शामिल हैं।
फंडों को लगता है कि उधारी चुकाने के जो उपाय किए गए हैं, वे सुरक्षित कर्जदाताओं के हित में ज्यादा हैं। छोटे निवेशकों और वेतनभोगी लोगों को दरकिनार कर दिया गया है। उधारी चुकाने के उपाय तय करते वक्त इन्हें भरोसे में भी नहीं लिया गया। कंपनी की उधारी दो तरह की होती है- फाइनेंशियल और ऑपरेशनल। बैंकों-वित्तीय संस्थानों की उधारी फाइनेंशियल श्रेणी में आती है। इन्हें सिक्योर्ड यानी सुरक्षित कर्जदाता कहा जाता है। दिवालिया होने पर अगर कंपनी के एसेट बेचकर पैसे चुकाने की नौबत आती है तो फाइनेंशियल उधारी वालों को प्राथमिकता मिलती है।
पिछले साल बैंकरप्सी कानून (आईबीसी)
में संशोधन करके घर खरीदारों को बैंकों के बराबर फाइनेंशियल क्रेडिटर का
दर्जा दिया गया। लेकिन दूसरे मामलों में ऐसा नहीं है।
इसने सितंबर 2018
में कर्ज लौटाने में पहली बार डिफॉल्ट किया था। इसके बाद 1 अक्टूबर को
सरकार ने इसके बोर्ड को भंग कर उदय कोटक की अध्यक्षता में नया बोर्ड बनाया।
कंपनी पर 90,000 करोड़ रुपए का कर्ज है। आइएलएंडएफएस समूह गंभीर नकदी संकट
से गुजर रहा है।
समूह की कंपनियों ने अगस्त से कई डिफॉल्ट किए हैं। स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने प्रतिष्ठित बैंकर उदय कोटक की अध्यक्षता में कंपनी के एक आठ सदस्यीय बोर्ड की नियुक्ति की है। सरकार ने पुराने बोर्ड को एक अक्टूबर 2018 को भंग कर दिया था। आइएलएंडएफएस समूह पर 94,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। सरकार को कंपनी की समाधान प्रक्रिया अगले चार-पांच महीने में पूरी हो जाने की उम्मीद है।