पंजाब

एम.एल.एफ. के आखिरी दिन हुए पहले सैशन के दौरान जी.बी.एस. सिद्धू की पुस्तक

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पैनेलिस्टों का सुझाव था कि मुद्दों को जोर-जबरदस्ती से नहीं बल्कि राजनीति ढंग के द्वारा हल किया जाना चाहिए था
चंडीगढ़ – चौथे मिलटरी लिटरेचर फेस्टिवल -2020 के आखिरी दिन के पहले सैशन की शुरूआत ‘जी.बी.एस. सिद्धू की लिखी पुस्तक ‘द खालिस्तान काँस्पीरेसी ’ पर विचार-चर्चा से की गई। जिसमें पैनलिस्टों ने वकालत की कि मुद्दों का निपटारा जोर-ज़बरदस्ती की जगह राजनैतिक ढंग से किया जाना चाहिए।इस सैशन का संचालन पूर्व आईपीएस अधिकारी जीएस औजला ने किया। इस दौरान पुस्तक के लेखक जीबीएस सिद्धू, एक पूर्व रॉ अधिकारी और पूर्व डीजीपी एमपीएस औलख व वरिष्ठतम पत्रकारों में से एक जगतार सिंह, जो कई दशकों से राज्य को कवर कर रहे थे, जैसे कई प्रख्यात पैनलिस्ट उपस्थित थे।सिक्किम को भारतीय क्षेत्र में शामिल करने के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जीबीएस सिद्धू ने विचार-विमर्श में भाग लेते हुए, पंजाब और विदेशों में विशेष रूप से कनाडा और अन्य यूरोपीय देशों, जहां सिखों ने 1970 के दशक के दौरान पलायन किया, में उग्रवाद के पनपने संबंधी पहलुओं को याद किया। उन्होंने उग्रवाद के इर्द-गिर्द घूमने वाले मुद्दों के हल हेतु उस समय के केंद्र सरकार के प्रयासों के बारे में प्रकाश डाला।जीएस औजला ने कहा कि उस समय राजनीतिक स्तर पर ‘मुद्दे’ का हल नहीं किया गया और इतिहास ने हमें एक बड़ा सबक सिखाया कि उस अवधि के दौरान मुद्दे को हल करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी।पूर्व डीजीपी एमपीएस औलख, जिन्होंने खुफिया ब्यूरो में प्रमुख पद संभाले थे, ने उस अवधि की घटनाओं की श्रृंखला का वर्णन किया।वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह, जिन्होंने ‘रिवर्स ऑन फायररू खालिस्तान स्ट्रगल’ पुस्तक भी लिखी, ने 40000 लोगों की जान लेने वाले उग्रवाद के समय के बारे में बात की और कहा कि खालिस्तान की कहानी ने अतीत में कनाडा जैसे देशों के साथ संबंधों को प्रभावित किया और यह मुद्दा आज भी कायम है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार को तस्वीर साफ करने के लिए उस समय से संबंधित कागजात सार्वजनिक करने चाहिए।

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