पंजाब

अतुल नन्दा ने बरगाड़ी मामले में सी.बी.आई. द्वारा दायर क्लोजऱ रिपोर्ट को कानूनी नज़रिए से गलत ठहराया

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राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2018 में केस वापस लेने के फ़ैसले के बाद केंद्रीय एजेंसी के पास जांच या रिपोर्ट दायर करने का कोई आधार नहीं

चंडीगढ़ – पंजाब के एडवोकेट जनरल अतुल नन्दा ने बरगाड़ी बेअदबी मामले में सी.बी.आई. की क्लोजऱ रिपोर्ट को कानूनी नज़रिए से गलत बताते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा पिछले वर्ष सी.बी.आई से केस वापस ले लेने के बाद इन मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।श्री नन्दा ने कहा कि सितम्बर, 2018 में राज्य सरकार ने इस एजेंसी से केस वापस लेने के लिए औपचारिक नोटिफिकेशन जारी किया था जिसके बाद क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करना तो एक तरफ़, यह एजेंसी इन मामलों में किसी तरह की पड़ताल करने की अथॉरिटी और अधिकार क्षेत्र गवा चुकी है। उन्होंने कहा कि क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करने की बजाय सी.बी.आई. द्वारा सही कानूनी राह अपनाते हुए अदालत को यह बताना बनता था कि पड़ताल का काम उसके सुपुर्द नहीं रहा। एडवोकेट जनरल ने बताया कि सी.बी.आई. द्वारा क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करने का अचानक लिया फ़ैसला सजि़श का हिस्सा है और इसके स्पष्ट संकेत इन मामलों में दोषी व्यक्तियों को क्लीन चिट देने के लिए एजेंसी द्वारा दिखाई गई जल्दबाज़ी से मिलते हैं। श्री नन्दा ने सी.बी.आई. के उस स्टैंड पर भी हैरानी ज़ाहिर की जिसमें केंद्रीय एजेंसी ने कहा था कि इन घटनाओं संबंधी पंजाब सरकार अनजान है जिस कारण उसका क्लोजऱ रिपोर्ट की कॉपी लेने का कोई हक नहीं बनता। सी.बी.आई. द्वारा लिए गए इस स्टैंड को बेतुका बताते हुए श्री नन्दा ने कहा कि एजेंसी ने अपनी क्लोजऱ रिपोर्ट में ही पंजाब पुलिस की रिपोर्टों और तथ्यों का हवाला दिया हुआ है।इस मामले में कानूनी स्थिति का खुलासा करते हुए एडवोकेट जनरल ने बताया कि स्पैशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट एक्ट (जिसके अधीन सी.बी.आई. कार्य करती है) की धारा 6 के अंतर्गत किसी भी राज्य में अपराधिक घटनाएँ घटती हैं तो उसकी पड़ताल के लिए आई.पी.सी. के अधीन सम्बन्धित राज्य सरकार की सहमति अपेक्षित है। पहले अकाली शासन द्वारा इस तरह की सहमति देने के बावजूद सदन के प्रस्ताव के तजऱ् पर 6 सितम्बर, 2018 को राज्य सरकार ने सी.बी.आई से यह केस वापस लेने के लिए औपचारिक नोटिफिकेशन पास कर दिया। उन्होंने आगे बताया कि इस कार्यवाही को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 25 जनवरी, 2019 को अपने निर्णय में कायम रखा जो कुछ दोषी पुलिस अफसरों द्वारा दर्ज किया गया था।दरअसल हाईकोर्ट ने नोट किया कि सी.बी.आई ने तकरीबन तीन साल बीतने के बावजूद पड़ताल में कोई भी प्रगति नहीं की। अदालत ने नोट किया था कि ‘‘सुनवाई के दौरान अदालत ने सी.बी.आई की केस डायरी की माँग की और इसका निरीक्षण किया। यह स्पष्ट था कि मामलों में कोई भी प्रगति नहीं हुई है। तकरीबन तीन साल बीत जाने के बावजूद पड़ताल के स्तर संबंधी सी.बी.आई के वकील को कुछ विशेष सवाल पूछे गए परन्तु कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। ’’दरअसल सी.बी.आई इस निर्णय को चुनौती देने में असफल रही जिससे स्पष्ट होता है कि वर्ष 2015 में इसके हवाले से केस करने के बाद यह कोई असरदार पड़ताल करने में असफल रही है और उसने अदालत के निष्कर्षों को स्वीकृत कर लिया है। एडवोकेट जनरल ने कहा कि इन मामलों में कोई भी प्रगति करने में सी.बी.आई के असफल रहने के उलट राज्य सरकार द्वारा गठित की गई एस.आई.टी. ने इनकी जांच की और इसमें महत्वपूर्ण प्रगति की। श्री नन्दा के अनुसार कुछ दोषियों से पूछ-ताछ करने के बावजूद एस.आई.टी. ने अन्य दोषियों की भूमिका का पर्दाफाश किया। कुछ दोषियों के घरों की छान-बीन की गई जिससे कई सबूत सामने आए जिनमें मोबाइल चिप, ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए कहने संबंधी बातचीत, गोला बारूद, घटनाएं करवाने के लिए 6 करोड़ रुपए तक के फंड का भुगतान आदि शामिल थे।

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