पंजाब

पंजाबी भाषा की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका विशाल और समृद्ध शब्द भंडार है-प्रिंसिपल सरवण सिंह

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पंजाब कला परिषद द्वारा रू-ब-रू प्रोग्राम के दौरान खेल-लेखक और चोटी के वार्तककार प्रिंसिपल सरवण सिंह का सम्मान

चंडीगढ़ – पंजाब कला परिषद द्वारा यहाँ पंजाब कला भवन में मनाए जा रहे सात दिवसीय डॉ. महेन्द्र सिंह रंधावा कला और साहित्य उत्सव के दौरान आज प्रसिद्ध खेल-लेखक और चोटी के वार्तककार प्रिंसिपल सरवण सिंह पाठकों के रू-ब-रू हुए। प्रिंसिपल सरवण सिंह ने पाठकों के साथ गुफ़्तगू करते हुए अपने 60 वर्षों के साहित्यिक सफऱ को सांझा करते हुए कॉलेज पढ़ते हुए लिखे पहले लेख से 38वीं पुस्तक ‘मेरे वार्तक के रंग’ की यादों को ताज़ा किया। उन्होंने सबसे पहले डॉ. महेन्द्र सिंह रंधावा को याद करते हुए उनके बारे ‘पंजाब के कोहेनूर’ पुस्तक में लिखे लम्बे शब्द चित्र की चुनिन्दा पंक्तियां पढ़ीं। उन्होंने कहा कि गद्य लिखना कविता लिखने के तुल्य है जिसकी अपनी लय होती है। अच्छी गद्य वह होती है जिसका पहला भाग पाठक को बाँध कर बिठा दे और आखिरी भाग पाठकों को सोचने के लिए मजबूर कर दे। उन्होंने कहा कि पंजाबी भाषा की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका अमीर और विशाल शब्द भंडार है। उन्होंने कहा कि पाठकों की कोई कमी नहीं है, ज़रूरत है सिफऱ् समय के साथ लेखकों के लेखन में बदलाव लाने की। उन्होंने कहा कि पंजाबी साहित्य का भविष्य बहुत सुनहरा है। अपने खेल-लेखन का जि़क्र करते हुए प्रिंसिपल सरवण सिंह ने कहा कि जीवन भी एक खेल है और खिलाड़ी सर्वकला संपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि खेल जीवन जांच सिखाते हैं, जैसे खेल में भार उठाने, तेज दौडऩे और डिस्कस फेंकने के पुराने रिकार्ड टूटते जाते हैं और नये सृजन किए जाते हैं, वैसे जि़ंदगी में नयी चुनौतियां आती रहती हैं जिनको पार करना ही बड़ी चुनौती होती है। उन्होंने नये लेखकों को नसीहत भी दी कि आसान, स्पष्ट और सरल भाषा का प्रयोग किया जाये जो पाठकों से सीधा संबंध कायम करे। उन्होंने नौजवानों को तंदुरूस्त पंजाब सृजन करने का न्योता देते हुए कहा कि हमारा क्षेत्र भौगोलिक तौर पर सबसे अमीर है जहाँ हमें कुदरती नियमों के भंडार मिले हैं। सिफऱ् ज़रूरत है, इनको सँभालने की। उन्होंने इस बात पर दुख भी प्रकट किया कि यूनिवर्सिटियों के भाषा वैज्ञानिकों और पंजाबी आलोचकों ने उनके खेल साहित्य को अनदेखा ही किया परंतु पाठकों के भरपूर प्रोत्साहन मिलने पर उसे लिखने के लिए सदा प्रेरित किया है। पंजाब कला परिषद के चेयरमैन डॉ. सुरजीत पातर ने प्रिंसिपल सरवण सिंह के लेखनों को पंजाबी गद्य का खज़़ाना करार देते हुए कहा कि गद्य का भी अपना पिंगल होता है और उनकी लिखित कविता की तरह लयमयी होती हैं। उन्होंने कहा कि यह लेखक की प्राप्ति है कि उसने अपनी चोटी की गद्य कला के बलबूते खेल में न रुचि रखने वाले पाठकों को भी खेल-साहित्य के साथ जोड़े रखा। उन्होंने अपने शब्दों के साथ खेल और खिलाडिय़ों का खज़़ाना संभाला है। परिषद के सचिव जनरल डॉ. लखविन्दर सिंह जौहल ने मंच संचालन किया। इस मौके पर प्रसिद्ध गीतकार शमशेर सिंह संधू और पंजाबी साहित्य अकादमी के पूर्व प्रधान डॉ. सुखदेव सिंह सिरसा ने प्रिंसिपल सरवण सिंह से जुड़ी अपनी, दिलचस्प यादों को सांझा किया। इससे पहले डॉ. पातर और डॉ.जौहल ने प्रिंसिपल सरवण सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती हरजीत कौर संधू को फूलों के गुलदस्ते, फुलकारी और पुस्तकों के सैट के साथ सम्मानित किया। इस मौके पर पंजाबी संगीत नाटक अकादमी के सचिव डॉ. निर्मल जोढ़ा, परिषद के मीडिया कोऑर्डीनेटर निंदर घुग्याणवी, केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा के प्रधान डॉ. सरबजीत सिंह, सुशील दुसांझ, शमील, गुरचरन सिंह शेरगिल्ल, सुखमिन्दर सिंह गज्जणवाला, प्रितपाल सिंह गिल, सुरिन्दर गिल आदि उपस्थित थे।

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