जीवन शैली
एग्रोफोबिया है डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण
एग्रोफोबिया है युवाओं में डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण
डिप्रेशन
युवाओं का सबसे बड़ा दुश्मन बन रहा है। अगर आपके आसपास 5 से 6 लोग रहते
हैं तो यकीनन उनमें से 1 व्यक्ति जरूर डिप्रेशन का शिकार होगा। यह बात अलग
है कि हमें डिप्रेशन के लक्षण समझ नहीं आते हैं या कई बार हम इसे डिप्रेशन
मानने से ही इंकार कर देते हैं। डिप्रेशन कहीं न कहीं फोबिया से संबंध रखता
है। अगर किसी इंसान को किसी चीज के पास जाने में या किसी चीज को खोने में
डर लगता है तो वह उसकी कमजोरी बनेगा और धीरे धीरे यही डिप्रेशन यानि कि
तनाव का रूप ले लेता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि एग्रोफोबिया किस तरह से
युवाओं के लिए खतरनाक है।
एग्रोफोबिया विचित्र प्रकार का डर
होता है। एग्रोफोबिया विचित्र प्रकार का डर होता है। इसमें व्यक्ति को बिना
किसी कारण के ही डर लगता रहता है। यह डर किसी चीज, व्यक्ति, जानवर या
परिस्थिति से जुड़ा हुआ न होकर खुद के प्रति ही होता है। एग्रोफोबिया के
होने पर किसी खुली सार्वजनिक जगह जैसे बाजार या गली में अकेले जा पाना
मुश्किल हो जाता है। बाहर निकलते ही अजीब सी बेचैनी और घुटन होने लगती है।
एग्रोफोबिया
युवाओं के लिए खतरनाक है। डिप्रेशन कहीं न कहीं फोबिया से संबंध रखता है।
फोबिया एक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति में किसी खास वस्तु, कार्य एवं
परिस्थिति के प्रति डर उत्पन्न हो जाता है। इसमें वह उन चीजों या स्थिति से
बचने की कोशिश करता है। फोबिया में व्यक्ति अपने डर की सोच भी डरने लगता
है कि उसकी मानसिक व शारीरिक क्षमताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसमें
डर वास्तविक या काल्पनिक दोनों तरह का हो सकता है।
ब्रिटिश
वैज्ञानिकों शोध टीम का नेतृत्व करने वाले डीन मोब्स के अनुसार, किसी चीज,
लोग, जानवर और परिस्थितियों से बिना किसी बात का डर और लगातार होता डर ही
फोबिया कहलाता है। आमतौर पर फोबिया में व्यक्ति को बंद स्थानों, ऊचाई,
हाईवे ड्राइविंग, सुरंग या पुल उड़ते हुए पक्षियों-कीड़े मकोड़ों, सांप,
तूफान, पानी, अंधेरे, खून बहने या चोट लगने का डर या इंजेक्शन अथवा किसी भी
अन्य चीज से डर लगता है। अधिकतर फोबिया बचपन में होता है लेकिन यह
वयस्कों को भी हो सकता है।
आमतौर पर फोबिया से पीडि़त लोग अपने
डर से दूर ही रहते हैं, लेकिन अनजाने में अपने अगर डर को सामने देखकर
उन्हें फोबिया का दौरा पड़ता है। ऐसे में उनमें तनाव, बेचैनी, पसीने आना,
परिस्थिति या लोगों से दूर भागना, सिर में भारीपन, कानों में अलग-अलग
आवाजें सुनाई देना, दिल की धड़कन बढ़ जाना, सांस तेज होना, डायरिया, चक्कर
आना, शरीर में कहीं भी दर्द को महसूस करना, पेट खराब हो जाना, ब्लड प्रेशर
बढ़ना या कम हो जाना जैसी दिक्कतें दिखाई देती हैं।
फोबिया किसी भी
उम्र में हो सकता है। लेकिन इसकी शुरूआत प्राय यौवन में ही शुरू हो जाती
है। शुरू होने पर यह विकार लंबे समय तक बना रहता है, लेकिन इसकी गंभीरता
घटती-बढ़ती रहती है। युवाओं को चाहिए कि अपने भीतर के फोबिया से बाहर
निकलें, अन्यथा इसका गहरा असर उनके आत्मविश्वास और कार्यक्षमता पर हो सकता
है।
फोबिया के इलाज के लिए कोई एक खास ट्रीटमेंट नहीं होता है
क्योंकि हर मरीज का फोबिया और उसकी परिस्थिति अलग-अलग होती है। इसलिए
फोबिया का इलाज डर के अनुरूप ही किया जाता है। फोबिया के इलाज के लिए
दवाएं, काउंसिलिंग, मनोवैज्ञानिक थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है।