पंजाब

मुख्यमंत्री ने एडवोकेट जनरल को बरगाड़ी केस में सी.बी.आई. की क्लोजऱ रिपोर्ट का विरोध करने के लिए कहा

बरगाड़ी मामले की जांच में रुकावट डालने और इन्साफ न मिलने के लिए सीधे तौर पर अकालियों को जि़म्मेदार ठहराया
चंडीगढ़ – पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने एडवोकेट जनरल को सी.बी.आई. अदालत में बरगाड़ी केस में सी.बी.आई. की क्लोजऱ रिपोर्ट का विरोध करने के हुक्म दिए हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की तरफ से जनवरी, 2011 में से टिप्पणियों के मद्देनज़र क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करना केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।मुख्यमंत्री ने यह हिदायतें एडवोकेट जनरल द्वारा क्लोजऱ रिपोर्ट से पहले के तथ्यों और परिस्थितियों की विस्तृत जाँच करने के बाद उनके साथ साझी की गई न्यायिक और कानूनी स्थिति के आधार पर दी हैं।इससे पहले विधानसभा में मुख्यमंत्री ने बरगाड़ी बेअदबी मामले की जांच में विघ्न डालने और दोषियों के खि़लाफ़ कार्यवाही में नाकामी के लिए सीधे तौर पर अकालियों को जि़म्मेदारी ठहराया।विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान आप के विधायक अमन अरोड़ा की तरफ से उठाए गए मुद्दे के जवाब में कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने ऐलान किया कि अकालियों द्वारा न्याय के रास्ते में बाधा डाले जाने के बावजूद उनकी सरकार इस केस को कानूनी निष्कर्ष पर ले जाएगी और पीडि़तों के लिए न्याय यकीनी बनाया जायेगा।इस समूचे मामले में अकालियों की शर्मनाक और रुकावट पैदा करने वाली भूमिका की सख्त आलोचना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अकालियों ने पहले जांच लटकाने के लिए केस सी.बी.आई. के हवाले कर दिए और अब केंद्रीय एजेंसी पर जल्दी से क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करने के लिए दबाव बनाया गया।कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कहा कि सी.बी.आई. ने जांच सही ढंग से नहीं की। उन्होंने कहा कि समकालीन उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री सुखबीर सिंह बादल की हिदायतों पर सी.बी.आई. ने जान-बूझ कर जांच आगे नहीं बढ़ाई। सदन में अकालियों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा,‘‘आपके कारण सी.बी.आई. ने जांच नहीं की।’’मुख्यमंत्री ने बताया कि सी.बी.आई. ने तो बरगाड़ी केस उससे वापस लेने संबंधी राज्य सरकार के फ़ैसले को चुनौती देने में रूचि दिखाई थी परन्तु बाद में क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करने का अचानक और अस्पष्ट फ़ैसला लिया गया।मुख्यमंत्री ने चरनजीत सिंह और अन्य बनाम स्टेट ऑफ पंजाब केस में 25 जनवरी, 2019 को दिए फ़ैसले के कुछ हिस्से को पढ़ते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा जांच में कोई प्रगति करने में सी.बी.आई. की नाकामी के तथ्य का नोटिस लेने का भी जि़क्र किया।अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा,‘‘तत्काल केस में राज्य पुलिस द्वारा एफ.आई.आरज़ पहले ही दर्ज की जा चुकी हैं और साल 2015 में जारी किये नोटिफिकेशन में सी.बी.आई को नोटीफिकेशन में स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट एफ.आई.आरज़ के अलावा केस दर्ज करने की आम शक्तियां नहीं हैं। इस कारण नोटिफिकेशन के अमल को वापस लेने की सहमति का सवाल ही नहीं उठता। दोरजी मामले में जारी हुए नोटीफिकेशनों के संदर्भ में स्पष्ट विभिन्नताएं देखी जा सकती हैं। तत्काल केस में पंजाब की सहमति विशेष रूप से एफ.आई.आरज़ के सम्बन्ध में थी और वास्तव में जांच एक एजेंसी से दूसरी जांच एजेंसी को तबदील करने तक थी। मौजूदा समय में कोई ऐसा केस नहीं है जोकि अदालत को ऐसी स्थिति की जाँच करने के लिए कहा गया है जहाँ राज्य ने सी.बी.आई. को अपराधों की एक श्रेणी के मामले में अपने आप केस दर्ज करने के लिए सहमति दी। दूसरी तरफ़, वापस लिया नोटिफिकेशन विधानसभा की तरफ के पास किये प्रस्ताव के अनुसार था जो यह स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि सी.बी.आई. को दिए मामलों की जांच वापस लेने की ज़रूरत है। इसके अलावा सुनवाई के दौरान, इस अदालत ने सी.बी.आई. की केस डायरी माँगी और इसको ध्यान से पढ़ा। यह स्पष्ट है कि इन मामलों की जांच शायद ही आगे बढ़ी हो।’’अदालत ने आगे कहा,‘‘उपरोक्त के मद्देनजऱ इस अदालत को विधानसभा के प्रस्ताव के अनुसार एक्ट की धारा 6 अधीन सहमति वापस लेने के लिए पंजाब सरकार द्वारा किये गए फ़ैसले में कोई त्रुटि नजऱ नहीं आती। तत्काल केस में सी.बी.आई. ने इस सहमति को वापस लेने का गंभीरता से विरोध नहीं किया। यहाँ तक कि जांच एजेंसी ने अपने जवाब में भी चुप-चाप दर्ज करवाया कि मामला जांच के अधीन है और उसकी तरफ से जांच वापस लेने के नोटिफिकेशन की प्रमाणिकता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया। दूसरी तरफ़ इसने अगली कार्यवाही के लिए नोटिफिकेशन भारत सरकार को भेज दिए।मुख्यमंत्री ने बताया कि अदालत द्वारा सी.बी.आई. के वकील को लगभग पिछले तीन वर्षों में लापरवाही के बावजूद जांच की प्रगति संबंधी विशेष तौर पर सवाल पूछे जाने पर कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया। मुख्यमंत्री ने अदालत का फ़ैसला पढ़ते हुए बताया,‘‘किसी भी वकील ने यह दिखाने के लिए किसी भी फ़ैसले का हवाला नहीं दिया कि राज्य पुलिस से सी.बी.आई. को जांच के लिए तबदील किये ऐसे मामलों में सहमति वापस लेने के लिए राज्य सरकार पर कोई बंधन है। इसके अलावा सहमति वापस लेने के कारण पड़ताल एक जांच एजेंसी द्वारा जारी रखी जायेगी न कि आंशिक तौर पर दो एजेंसियों द्वारा रखी जायेगी। घटनाओं की श्रृंखला यह दर्शाती है कि यह एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं जिस कारण यह अदालत सी.बी.आई. से जांच वापस लेने या नोटिफिकेशन रद्द करने संबंधी राज्य सरकार के फ़ैसले में दखलअन्दाज़ी की ज़रूरत महसूस नहीं करती। कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने इस तथ्य का भी जि़क्र किया कि अदालत ने राज्य सरकार द्वारा कायम की गई एस.आई.टी. को जांच के लिए पूर्ण रूप से समर्थ बताया। उन्होंने अदालत के हवाले का जि़क्र करते हुए बताया,‘‘इस अदालत को कानूनी निष्कर्ष पर पहुंचने के उद्देश्य में कोई संदेह नहीं है। एस.आई.टी. अपनी जांच के लिए सभी जाँच कौशल और फोरेंसिक तरीकों का प्रयोग करेगी।’मुख्यमंत्री ने सदन में इन तथ्यों और परिस्थितियों का हवाला देते हुए बताया कि यह और भी स्पष्ट है कि बरगाड़ी केस में क्लोजऱ रिपोर्ट दायर करना गलत और न्याय के हित में नहीं था।

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