पंजाब

जिग-जैग तकनीक ना अपनाने वाले भट्टे 30 सितम्बर के बाद नहीं जल सकेंगे- पन्नू

चंडीगढ़ – राज्य के सभी भट्टा मालिकों को 4 महीनों का समय देते हुये भट्टों में जिग-जैग तकनीक अपनाने के निर्देश दिए गए हैं। यह जानकारी डायरैक्टर मिशन तंदुरुस्त पंजाब स. के.एस. पन्नू ने दी। स. पन्नू ने बताया कि पर्यावरण सुरक्षा एक्ट 1986 के सैक्शन 5 के अधीन रिवायती तकनीक पर आधारित ईंटें बनाने वाले भट्टों के काम-काज पर 30 सितम्बर, 2019 के बाद रोक लगाने के आदेश जारी किये गए थे। यह आदेश मई 2019 दौरान जारी किये गए थे और तंदुरुस्त पंजाब मिशन के अधीन इस सम्बन्धी सभी डिप्टी कमीश्नरों को याद-पत्र जारी किये गये हैं। उन्होंने कहा कि ईंटें बनाने वाले इन भट्टों के रिवायती डिज़ाइन के कारण न सिफऱ् ऊर्जा की ज़्यादा खपत होती है बल्कि यह विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और पर्यावरण से सम्बन्धित मुद्दों का कारण भी बनता है। परन्तु इस नये डिज़ाइन से कार्बन के निकास में कमी आएगी जिससे पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी घटेगी। इसके साथ ही इस नवीन तकनीक को अपनाने से कीमती संसाधनों (मिट्टी और कोयले) में 20 से 30 प्रतिशत की सीधी बचत है। इसके साथ ही जिग-जैग तकनीक को अपनाने से इंडस्ट्री द्वारा एक सीजन के दौरान प्रति भट्टे पर कोयले की 25 फीसदी बचत दर्ज की गई है जोकि 15 लाख रुपए बनती है। उन्होंने बताया कि भट्टों में जिग-जैग तकनीक अपनाने के लिए प्रति भट्टा 20 से 25 लाख रुपए की शुरुआती लागत आती है, परन्तु ईंटों के मानक में सुधार और कोयले की कम खपत के पक्ष से यह राशि आसानी के साथ एक वर्ष के अंदर रिकवर हो जाती है।उन्होंने बताया कि यहाँ पंजाब में ईंटें बनाने वाले तकरीबन 2854 भट्टे हैं जिनमें से 1300 भट्टे आधुनिक तकनीक की शुरुआत की तरफ बढ़ गए हैं। इनमें से 700 भट्टे जिग-जैग तकनीक की तरफ पूरी तरह तबदील हो गए हैं जबकि बाकी प्रक्रिया अधीन हैं। परन्तु लगभग 1550 भट्टा मालिकों ने इस नवीन तकनीक की तरफ बढऩे के लिए अभी कोई कदम नहीं उठाया है। ऐसे भट्टा मालिकों को चेतावनी देते हुये पन्नू ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय सीमा के बाद राज्य में ऐसे किसी भी भट्टे के काम-काज को ठप्प किया जायेगा। सख्त चेतावनी देते हुये स. पन्नू ने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ी तो 30 सितम्बर के बाद उक्त डिफालटरों को कोयले की सप्लाई बंद की जायेगी। स. पन्नू ने सचेत करते हुये कहा कि अगर सर्दियों के महीनों के दौरान ये ईंटें बनाने वाले 3000 भट्टे कोयले से जलाये जाते हैं तो कम तापमान और उच्च नमी के कारण प्रदूषित हवा आस-पासनहीं फेलती। अक्तूबर और नवंबर महीनों के दौरान पराली जलने से पैदा हुयी ज़हरीली गैसों के वायु में शामिल होने से साथ यह समस्या और भी बढ़ जाती है। इसलिए यह ज़रूरी है कि हमें जल्द से जल्द पर्यावरण-समर्थकी तकनीक अपनाने की तरफ रूख कर लेना चाहिए।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

four × 3 =

Most Popular

To Top