कांगड़ा

गुग्गा मंदिर में ठीक होते हैं सर्पदंश पीड़ित

पालमपुर, हिमाचल देवी-देवताओं, ऋषि मुनियों और पीर-पैगंबरों की धरती होने के कारण ही प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। प्रदेश के शक्तिपीठों और मंदिरों पर लोगों की अटूट आस्था है। यहां ऐसे कई देव स्थल हैं जहां दर्शन मात्र से ही कई प्रकार के शारीरिक कष्टों एवं बिमारियांे के दूर होने के उदाहरण और किस्से सुनने पढ़ने को मिलते हैं। ऐसा ही एक पवित्र स्थान पठानकोट-मण्डी राष्ट्रीय उच्च मार्ग स्थित अरला से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्राम पंचायत सलोह में जहरवीर गुग्गा जी महाराज का प्राचीन मन्दिर है। यहां सर्पदंश और मानसिक तथा शारीरिक कष्ट से ग्रसित लोगों के ठीक होने के कई उदारण देखने में सामने आते रहे हैं। प्रति वर्ष रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक इस क्षेत्र में उत्सव सा महोल रहता है। इस दौरान देश भर से लोग यहां माथा टेकने पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां माथा टेकने मात्र से ही सर्पदंश नहीं होता और यहां की मिट्टी के छिड़काव से घरों में सांप इत्यादि का प्रवेश भी नहीं होता है।

गांव सलोह, कथियाड़ा तथा आस-पास के गांवों के लोग रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक नंगे पांव रहते हैं। सोने के लिए भूमि आसन का प्रयोग किया जाता है और 10 दिनों तक उपवास में रहते हुए सिर के बाल तथा दाढ़ी इत्यादि नहीं कटवाते हैं। मेले के दस दिनों में जहरवीर गुग्गा जी महाराज के छत्र साथ सभी गांवो में अढ़ाई फेरी लगाई जाती है, जिसमें भक्त नंगे पांव शामिल होते हैं। इन्हीं दिनों में गुग्गा जी महाराज का छत्र लेकर पुजारी श्रद्धालुओं सहित गांव-गांव जाकर गुग्गा जी की गाथा भी सुनाते हैं। मंदिर में दिन रात दर्शनों के लिए भारी संख्या में देशभर से लोग पहुंचते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि जो लोग भूतप्रेत इत्यादि के साये तथा अन्य बीमारियों से पीड़ित होते हैं मंदिर में माथा टेकने और दस दिनों तक यहां रहकर गुग्गा मन्दिर के भीतर या बाहर परिक्रमा कर ग्यारवें दिन ठीक होकर अपने अपने घरों को खुशी-खुशी जाते हैं।

ऐसी भी मान्यता है कि आपे से बाहर हुए लोगों को मन्दिर के प्रंागण में स्थित प्राचीन अलिया नामक पेड़ से बांधने से लोग ठीक होकर मन्दिर की परिक्रमा करने लगते हैं। यह भी मान्यता है कि गुगा मन्दिर में सांप के काटे हुए लोग भी ठीक होते हैं। जहर वीरगुग्गा जी को सर्पों का ईष्ट देव माना गया है। बुजुर्गों का मानना है कि इस इलाके के आस पास कहीं भी किसी को सर्पदंश होने पर मन्दिर में रखा ढोल अपने आप बजने लगता था और पीड़ित व्यक्ति मन्दिर में आकर बिल्कुल ठीक हो जाता था। आज भी सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति मन्दिर में दस दिन रहकर ठीक होते हैं। दंतकथा के मुताबिक मन्दिर का निमार्ण संवत् 1898 में पुजारी पफुउ राम ने करवाया था। राजस्थान के गांव दुढेरा के रहने वाले पफुउ राम को सपने में जहरवीर गुग्गा देवता ने साक्षात दर्शन देकर कहा कि आप मेरा मन्दिर कांगड़ा जिला के सलोह गांव में बनायें, ताकि वहां पर दीन दुखियों की सहायता कर सकंू। पफुउ रामजी ने सलोह में बहुत बड़ा मन्दिर बनवाया और आज पफुउ राम के पौत्र इस मन्दिर के पुजारी हैं।

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